चंडीगढ़ के सरकारी मकानों की मरम्मत में ‘खेल’! ऑनलाइन पोर्टल के बावजूद महीनों लटकती फाइलें

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चंडीगढ़ प्रशासन के सरकारी मकानों की मरम्मत व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कहने को सरकारी मकानों की मेंटिनेंस के लिए ऑनलाइन व्यवस्था और निर्धारित प्रक्रिया मौजूद है, लेकिन धरातल पर स्थिति यह बताई जा रही है कि एक सामान्य मरम्मत का काम भी कई-कई महीनों तक फाइलों में उलझा रहता है। इस बीच सरकारी मकान में रहने वाले अलॉटी को परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कई मामलों में उसे मजबूर होकर अपने खर्च पर मरम्मत करवानी पड़ती है।

हाल ही में सामने आए एक मामले में सरकारी मकान की मरम्मत में 67 दिन की देरी को लेकर राइट टू सर्विस आयोग ने इंजीनियरिंग विभाग के जूनियर इंजीनियर को जिम्मेदार ठहराते हुए 5 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। आयोग ने जुर्माने की 50 फीसदी राशि शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में देने के निर्देश भी दिए। यह मामला सरकारी मकानों की मेंटिनेंस व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

 

महिला अधिकारी के मकान की मरम्मत में हुई देरी

आयोग के सामने आए मामले के अनुसार सरकारी मकान की मरम्मत के लिए निर्धारित समय सीमा के भीतर काम पूरा नहीं किया गया। शिकायतकर्ता की ओर से बार-बार संबंधित अधिकारियों से संपर्क किए जाने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ। अंततः मामला राइट टू सर्विस आयोग तक पहुंचा।

आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, मरम्मत का आवेदन मिलने के बाद भी निर्धारित समय में काम पूरा नहीं किया गया। आयोग ने संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी तय करते हुए कार्रवाई की। इससे यह सवाल उठता है कि अगर एक अधिकारी को अपने सरकारी आवास की सामान्य मरम्मत के लिए भी आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो आम अलॉटी की स्थिति क्या होगी?

 

हर मकान को नहीं मिलती समान ‘सर्विस’?

सरकारी मकानों की मेंटिनेंस को लेकर सबसे बड़ा सवाल चुनिंदा मकानों और चुनिंदा विभागों को प्राथमिकता दिए जाने के आरोपों का है। आरोप है कि प्रभावशाली अधिकारियों या खास विभागों से जुड़े सरकारी मकानों की मरम्मत अपेक्षाकृत तेजी से हो जाती है, जबकि सामान्य अलॉटी को महीनों तक जेई, एसडीओ और अन्य अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

हालांकि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है। यदि पिछले दो वर्षों में सरकारी मकानों की मरम्मत के लिए प्राप्त शिकायतों, स्वीकृत कार्यों, खर्च और काम पूरा होने में लगे समय का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए तो यह स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।

 

जेई से लेकर अधिकारियों तक घूमती रहती है फाइल

अलॉटी की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि मरम्मत की फाइल जेई से शुरू होकर एसडीओ और वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचने में ही काफी समय ले लेती है। इसके बाद ड्राइंग ब्रांच में ऑब्जेक्शन लगने की स्थिति में फाइल फिर वापस घूमती रहती है।

आरोप यह भी है कि कई मामलों में छोटी-छोटी मरम्मत के लिए भी प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि जब तक अनुमति और टेंडर की प्रक्रिया पूरी होती है, तब तक अलॉटी महीनों तक समस्या झेल चुका होता है।

 

समय पर टेंडर नहीं, तो अलॉटी खुद करवाता है काम

एक गंभीर सवाल टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी है। यदि किसी मकान की मरम्मत के लिए समय पर टेंडर नहीं लगाया जाता या प्रक्रिया पूरी नहीं होती तो इसका खामियाजा अलॉटी को भुगतना पड़ता है।

कई अलॉटी का आरोप है कि संबंधित जेई और एसडीओ फोन तक नहीं उठाते। बार-बार संपर्क करने के बावजूद जब सरकारी स्तर पर मरम्मत नहीं होती तो आखिरकार अलॉटी अपने खर्च पर काम करवाने को मजबूर हो जाता है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अलॉटी ने स्वयं मरम्मत करवाई तो बाद में उसी मकान की मरम्मत के नाम पर सरकारी बिल कैसे तैयार होते हैं? यदि ऐसे मामले वास्तव में हुए हैं तो यह गंभीर जांच का विषय है और प्रत्येक भुगतान की तकनीकी व वित्तीय जांच जरूरी है।

 

सरकारी मकानों की मरम्मत और रखरखाव पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होने की बात सामने आती है। ऐसे में प्रशासन को चाहिए कि वह पिछले कम से कम दो वर्षों का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करे—

कितने सरकारी मकानों की मरम्मत के आवेदन आए?

कितने मामलों में निर्धारित समय सीमा में काम हुआ?

कितने आवेदन लंबित रहे?

किस मकान पर कितनी राशि खर्च हुई?

किस ठेकेदार को कितना भुगतान किया गया?

कितने मकानों की मरम्मत का काम टेंडर के जरिए हुआ?

कितने मामलों में अलॉटी ने स्वयं काम करवाया?

क्या ऐसे मामलों में बाद में सरकारी भुगतान हुआ?

किन अधिकारियों/विभागों के मकानों पर सबसे ज्यादा खर्च हुआ?

मरम्मत में देरी के लिए कितने जेई, एसडीओ या अन्य अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई?

इन सवालों के जवाब सामने आने से सरकारी मकानों की मेंटिनेंस व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।

 

हरियाणा के एचसीएस अधिकारी का मकान भी बना उदाहरण

 

एक अन्य मामले में हरियाणा के एक एचसीएस अधिकारी को आवंटित सरकारी मकान की समय पर मरम्मत नहीं होने के कारण मकान सरेंडर किए जाने की बात भी सामने आई थी। यदि एक वरिष्ठ अधिकारी को भी समय पर सरकारी आवास की आवश्यक मरम्मत नहीं मिलती और उसे मकान छोड़ना पड़ता, तो यह व्यवस्था की गंभीरता को दर्शाता है।

 

ऑनलाइन पोर्टल है तो जवाबदेही भी ऑनलाइन हो

प्रशासन ने सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन करने की दिशा में कदम उठाए हैं। ऐसे में सरकारी मकानों की मेंटिनेंस के लिए भी ऑनलाइन आवेदन, स्वीकृति, जेई की रिपोर्ट, अनुमान, टेंडर, काम की शुरुआत, काम पूरा होने और भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन ट्रैक करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

हर अलॉटी को यह पता चलना चाहिए कि उसकी शिकायत किस अधिकारी के पास लंबित है और कितने दिन से लंबित है। यदि निर्धारित समय सीमा पार हो जाए तो सिस्टम अपने आप संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय करे।

 

दो साल के आवंटन और मरम्मत रिकॉर्ड की हो विजिलेंस जांच

 

सरकारी मकानों की मरम्मत में कथित अनियमितताओं को देखते हुए पिछले दो वर्षों में आवंटित मकानों और उन पर हुए मेंटिनेंस खर्च की विजिलेंस जांच की मांग उठना स्वाभाविक है। खासकर उन मामलों की जांच होनी चाहिए जहां एक ही मकान पर बार-बार मरम्मत के नाम पर भुगतान हुआ हो, जहां अलॉटी ने खुद काम करवाने का दावा किया हो अथवा जहां काम हुए बिना भुगतान का आरोप हो।

67 दिन की देरी पर जेई पर लगा 5 हजार रुपये का जुर्माना महज एक मामला नहीं, बल्कि सरकारी मकानों की मेंटिनेंस व्यवस्था की पूरी कार्यप्रणाली की समीक्षा का अवसर है। प्रशासन यदि निष्पक्ष जांच कर पिछले दो वर्षों का मकानवार खर्च और शिकायतों का रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दे, तो यह साफ हो सकता है कि सरकारी मकानों की मरम्मत व्यवस्था वास्तव में ऑनलाइन और पारदर्शी है या फिर फाइलों और अधिकारियों के चक्कर में ही फंसी हुई है।

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