चंडीगढ़ में आवारा पशुओं का बढ़ता कहर: सड़कों पर खतरा, हादसों में इज़ाफा, समाधान कब?
चंडीगढ़, जिसे सिटी ब्यूटीफुल के नाम से जाना जाता है, इन दिनों एक बढ़ती हुई शहरी चुनौती का सामना कर रहा है, जहां सड़कों पर आवारा और बेसहारा पशुओं की बढ़ती संख्या लोगों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। रोजाना हो रहे सड़क हादसे, घायल होते नागरिक और प्रशासन की धीमी कार्यवाही ने स्थिति को और चिंताजनक बना दिया है। शहर के लगभग हर सेक्टर और प्रमुख मार्गों पर बड़ी संख्या में आवारा पशु घूमते दिखाई देते हैं, और रात के समय यह समस्या और भी ज्यादा खतरनाक रूप ले लेती है। खासकर व्यस्त सड़कों जैसे मध्य मार्ग पर काले रंग के सांड अक्सर वाहन चालकों को समय पर नजर नहीं आते, जिससे दोपहिया सवार सबसे ज्यादा दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं। हाल ही में एक घटना में अचानक सड़क पर गाय आ जाने से एक कार चालक को तेज ब्रेक लगानी पड़ी, जिसके चलते पीछे आ रही कई गाड़ियां आपस में टकरा गईं, और इस तरह की घटनाएं अब आम होती जा रही हैं।
समस्या सिर्फ सड़कों पर पशुओं की मौजूदगी तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके आपसी झगड़े भी लोगों के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं। सांडों की लड़ाई के दौरान राहगीर और वाहन चालक बीच में फंसकर घायल हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब तक कई लोग इन घटनाओं में अपनी जान गंवा चुके हैं या गंभीर रूप से चोटिल हुए हैं। चिंताजनक बात यह है कि यह समस्या केवल बाहरी इलाकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि शहर की पॉश कॉलोनियों में भी आवारा पशुओं के झुंड खुलेआम घूमते नजर आते हैं, जिससे पार्कों, बाजारों और रिहायशी सड़कों पर लोगों का निकलना तक मुश्किल हो गया है। हाल ही में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकारों और यूटी प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि नगर निगम की सड़कों पर एक भी आवारा पशु नहीं होना चाहिए और इस संबंध में जवाब भी मांगा गया था, लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई का अभाव साफ नजर आ रहा है।
नगर निगम द्वारा गऊशालाओं और नंदीशालाओं के निर्माण को लेकर कई दावे किए गए, लेकिन इन योजनाओं का प्रभाव अभी तक दिखाई नहीं दे रहा है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि जनप्रतिनिधि और अधिकारी केवल योजनाओं की घोषणा तक ही सीमित हैं और वास्तविक समाधान की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे। शहर के लोगों में इस मुद्दे को लेकर रोष बढ़ता जा रहा है और वे सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक आवारा पशुओं को पकड़ने, उनके पुनर्वास और मालिकों पर सख्त कार्रवाई की व्यवस्था नहीं की जाएगी, तब तक यह समस्या यूं ही बनी रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए व्यापक रणनीति की जरूरत है, जिसमें पशुओं की पहचान और पंजीकरण, पर्याप्त गऊशालाओं का निर्माण, सड़कों से पशुओं को हटाने के लिए विशेष अभियान, पशु मालिकों पर जुर्माना और नागरिकों में जागरूकता बढ़ाना शामिल होना चाहिए।
चंडीगढ़ जैसे सुनियोजित शहर में आवारा पशुओं की यह स्थिति प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। जब तक इस समस्या पर सख्ती से कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक आम नागरिकों को रोजाना खतरे और अनिश्चितता के बीच ही जीवन बिताना पड़ेगा, और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिरकार शहरवासियों को इस परेशानी से स्थायी राहत कब मिलेगी।
