BRICS देशों का बड़ा फैसला: ‘Scam Compounds’ पर सख्ती, AI के लिए वैश्विक नियमों पर बनी सहमति
स्कैम नेटवर्क अक्सर फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म, रोमांस स्कैम और नकली नौकरी के ऑफर के जरिए लोगों को ठगी का शिकार बनाते हैं। व्यापार और जलवायु से जुड़े मुद्दों के बीच BRICS नेताओं द्वारा जारी नई दिल्ली घोषणा में सदस्य देशों के लिए दो तेजी से गंभीर होते मुद्दों पर भी चर्चा की गई— संगठित डिजिटल धोखाधड़ी के बढ़ते नेटवर्क और AI को लेकर समन्वित वैश्विक नियमों की जरूरत।
शनिवार को BRICS के 11 सदस्य देशों ने इस घोषणा को सर्वसम्मति से मंजूरी दी। इसमें संगठित ठगी नेटवर्क के बढ़ते मामलों पर गंभीर चिंता जताई गई। खास तौर पर सीमा पार चलने वाले ऑपरेशन्स और कथित ‘स्कैम कंपाउंड्स’ का उल्लेख किया गया, जहां डिजिटल तकनीक, पेमेंट सिस्टम और कमजोर लोगों का फायदा उठाकर ठगी की जाती है।
इन नेटवर्क्स में अक्सर फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म, रोमांस स्कैम और नकली नौकरी के ऑफर का इस्तेमाल किया जाता है। ठगी से हासिल रकम को बाद में डिजिटल पेमेंट चैनलों के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग के माध्यम से छिपाया जाता है।
इनसे निपटने के लिए घोषणा में कस्टम विभाग, वित्तीय खुफिया इकाइयों, पुलिस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों, टैक्स विभाग और निगरानी संस्थाओं के बीच बेहतर सहयोग की अपील की गई है। टेलीकॉम कंपनियों और टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स से भी जानकारी साझा करने और डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल बढ़ाने को कहा गया है, ताकि मनी लॉन्ड्रिंग जैसी गतिविधियों का पहले ही पता लगाया जा सके।
भुगतान और स्थानीय मुद्रा पर रुख
पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर BRICS नेताओं ने दोहराया कि व्यापार को स्थानीय मुद्राओं में निपटाने के लिए ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ यानी एक ही तरीका सभी देशों पर लागू नहीं हो सकता। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की व्यापक कोशिश अभी शुरुआती और खोजी चरण में है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और IIIT हैदराबाद के निदेशक संदीप के. शुक्ला ने कहा कि घोषणा में साइबर फ्रॉड, दक्षिण-पूर्व एशिया के स्कैम कंपाउंड्स और सीमा पार साइबर अपराध को गंभीर समस्या माना गया है। साथ ही BRICS देशों के बीच CERTs, वित्तीय खुफिया इकाइयों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के जरिए सहयोग की बात कही गई है।
हालांकि, उनके मुताबिक यह सहयोग बाध्यकारी नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अपराध से निपटने के लिए आवश्यकताओं को सामने रखने जैसा है।
उन्होंने यह भी कहा कि घोषणा में देशों को UN Cybercrime Treaty पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है, लेकिन भारत ने अभी तक इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, जबकि 70 से ज्यादा देश ऐसा कर चुके हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि प्राइवेसी कानून और व्यक्तिगत जानकारी (PII) साझा करने से जुड़ी सीमाएं देशों के बीच पूरी तरह सहयोग में बाधा बन सकती हैं। उनके अनुसार घोषणा ने यह स्वीकार किया है कि सीमा पार साइबर अपराध से निपटना अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना मुश्किल है, लेकिन इससे आगे बढ़कर इस समस्या को दूर करने के लिए कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं दिया गया है।
घोषणा में वित्तीय क्षेत्र की क्षमता बढ़ाने के लिए BRICS Central Bank Hub की स्थापना का स्वागत किया गया। साथ ही वित्तीय क्षेत्र की साइबर सुरक्षा मजबूत करने के लिए हर साल साइबर सिक्योरिटी एक्सरसाइज कराने का समर्थन किया गया। सीमा पार पेमेंट सिस्टम में धोखाधड़ी रोकने पर भी जोर दिया गया।
AI पर BRICS का फोकस
घोषणा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को भी प्रमुखता दी गई। इसमें ऊर्जा ग्रिड से लेकर पर्यटन तक कई क्षेत्रों में AI के इस्तेमाल का जिक्र किया गया।
सबसे महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता BRICS Leaders’ Statement on the Global Governance of Artificial Intelligence को लागू करने की रही। यह भारत में हुए AI Impact Summit और इस साल की शुरुआत में शंघाई में आयोजित World AI Conference में हुई चर्चाओं पर आधारित है।
घोषणा में AI को खासकर विकासशील देशों के लिए आर्थिक विकास का बड़ा अवसर बताया गया। हालांकि, AI सिस्टम में सुरक्षा, भरोसेमंदता और ऊर्जा दक्षता सुनिश्चित करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया।
BRICS नेताओं ने कहा कि AI को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग ऐसा होना चाहिए जिससे न्यायपूर्ण, समान और समृद्ध भविष्य बनाया जा सके। खास ध्यान इस बात पर दिया गया कि Global South के देश AI की दौड़ में पीछे न छूटें।
वित्तीय क्षेत्र को भी ऐसा क्षेत्र बताया गया जहां AI और क्वांटम कंप्यूटिंग से जुड़े जोखिमों और अवसरों की करीबी निगरानी जरूरी है। इसके लिए उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की जरूरतों को ध्यान में रखने की बात कही गई।
AI और बौद्धिक संपदा को लेकर चिंता
घोषणा में इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (बौद्धिक संपदा) को लेकर भी चिंता जताई गई। नेताओं ने कहा कि AI की ट्रेनिंग में इस्तेमाल होने वाला डेटा और AI मॉडल उन समुदायों के सांस्कृतिक ज्ञान और विरासत के गलत इस्तेमाल या गलत प्रतिनिधित्व का कारण बन सकते हैं, जिन्हें मौजूदा डेटा सेट्स में पर्याप्त जगह नहीं मिली है।
