कपिल, धोनी से पुजारा तक… क्रिकेट के दिग्गजों को पहचान देने वाला टूर्नामेंट अब हुआ इतिहास
कपिल से धोनी तक को मंच देने वाला जेपी अत्रे क्रिकेट टूर्नामेंट 30 संस्करणों बाद बंद
चेतेश्वर पुजारा उस समय मैच के बीच में बल्लेबाजी कर रहे थे, जब उन्हें यह खबर मिली। वह अपनी राज्य की टीम के लिए ऑल इंडिया जेपी अत्रे क्रिकेट टूर्नामेंट खेल रहे थे। यह ऐसा घरेलू टूर्नामेंट था, जिसे मैदान के बाहर शायद ही कोई देख रहा था। तभी उन्हें खबर मिली कि अक्टूबर 2010 से ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ घरेलू टेस्ट सीरीज के लिए भारतीय टेस्ट टीम में उनका चयन हो गया है।
टूर्नामेंट के संस्थापक आयोजन सचिव कैप्टन सुशील कपूर को यह पल आज भी याद है। टूर्नामेंट में मिली किसी भी ट्रॉफी से ज्यादा उनके लिए इस घटना की अहमियत है। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “हम सभी उस खुशी को महसूस कर सकते थे। हमारा टूर्नामेंट युवाओं को यही मौका देने के लिए था।”
इस टूर्नामेंट में इस साल आखिरी गेंद फेंकी गई। 34 वर्षों में 30 संस्करणों के आयोजन के बाद ऑल इंडिया जेपी अत्रे क्रिकेट टूर्नामेंट को बंद कर दिया गया। आयोजकों के लिए लगातार व्यस्त होते क्रिकेट कैलेंडर में आयोजन के लिए मैदान तलाशना मुश्किल हो गया था। इसके अलावा, हाल के संस्करणों में ज्यादातर अंडर-23 टीमें ही हिस्सा ले रही थीं।
इस टूर्नामेंट की शुरुआत एक दुखद घटना के बाद हुई थी। हरियाणा क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष और राज्य के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक जेपी अत्रे का 1991 में 50 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था। कपूर बताते हैं, “वह HCA के अध्यक्ष होने के साथ-साथ क्रिकेट प्रेमी भी थे। उनके निधन के बाद हमने उनकी याद में एक दिवसीय टूर्नामेंट आयोजित करने का फैसला किया।”
उस समय पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे आईएस बिंद्रा ने उसी साल पहला संस्करण शुरू कराने में मदद की। टूर्नामेंट में छह टीमों ने हिस्सा लिया और 1983 विश्व कप विजेता टीम के अपने साथी यशपाल शर्मा के साथ कपिल देव SWIL XI की ओर से मैदान पर उतरे। कपूर कहते हैं, “उन्हें खेलते देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती थी।”
इसके बाद यह टूर्नामेंट लगातार क्रिकेट की बड़ी कहानियों का हिस्सा बनता गया। 2008 में सौरव गांगुली को ईरानी ट्रॉफी की टीम से बाहर किए जाने के बाद उन्होंने वापसी की कोशिश के तहत यहां खेला। कपूर के मुताबिक, उस समय दर्शकों का उत्साह उन्हें कपिल देव के लिए उमड़ी भीड़ की याद दिलाता था।
उन्हें युवा एमएस धोनी भी याद हैं, जो बिहार की ओर से खेलते हुए सेक्टर-16 मैदान पर पंजाब के बड़े स्कोर का पीछा करने के दौरान लगातार छक्के लगा रहे थे। उन्हें मनोज प्रभाकर का वह किस्सा भी याद है, जब वह मैच खत्म होते ही अपनी शादी की सालगिरह के लिए दिल्ली जाने वाली शाम की ट्रेन पकड़ने निकले थे और कपूर खुद उन्हें स्टेशन छोड़ने गए थे।
इंतखाब आलम के मुख्य अतिथि बनकर टूर्नामेंट में पहुंचने की याद भी कपूर के जेहन में है। उस समय टूर्नामेंट में खेलने वाला हर युवा खिलाड़ी उनका ऑटोग्राफ लेना चाहता था।
140 से ज्यादा ऐसे खिलाड़ी इस टूर्नामेंट से जुड़े, जिन्होंने आगे चलकर भारत का प्रतिनिधित्व किया। शुरुआत में छह टीमों से शुरू हुआ यह टूर्नामेंट बढ़कर 16 टीमों तक पहुंच गया। इसमें ONGC और एयर इंडिया जैसी टीमें भी राज्य क्रिकेट संघों के साथ हिस्सा लेने लगीं। पहले साल की 75 हजार रुपये की पुरस्कार राशि बढ़कर अंतिम संस्करण में 3 लाख रुपये हो गई।
तीन दशकों से अधिक के सफर में टूर्नामेंट के मुकाबले अलग-अलग मैदानों पर खेले गए—सेक्टर-16, आईएस बिंद्रा पीसीए इंटरनेशनल स्टेडियम और पटियाला का ध्रुव पांडोव स्टेडियम।
वीवीएस लक्ष्मण ने इस टूर्नामेंट में कभी नहीं खेला, लेकिन कपूर को याद है कि उन्होंने इसकी तारीफ जरूर की थी। खासकर इसलिए कि यह टूर्नामेंट हैदराबाद के युवा क्रिकेटरों में इसमें खेलने की भूख पैदा करता था।
आयोजक महिलाओं के लिए होने वाले रामा अत्रे टूर्नामेंट का आयोजन जारी रखेंगे, जिसका सातवां संस्करण इसी महीने के अंत में होगा। लेकिन पुरुषों का टूर्नामेंट शुरुआत से ही एकदिवसीय प्रारूप पर आधारित था और आयोजक इसे जिंदा रखने के लिए किसी दूसरे प्रारूप में बदलना नहीं चाहते थे।
टूर्नामेंट के संयोजक और जेपी अत्रे के बेटे विवेक अत्रे कहते हैं, “टूर्नामेंट की सबसे बड़ी विरासत यही रही कि उसने युवाओं को रन बनाने और विकेट लेने का मौका दिया। इसके बाद उन्होंने जहां भी सफलता हासिल की—चाहे भारतीय टीम की जर्सी में या राज्य की टीम के लिए—उन्हें आगे बढ़ते देखना हमारे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि थी।”
30 संस्करणों के बाद भी कपूर के जेहन में सबसे पहले वही कहानी आती है, जब एक युवा खिलाड़ी को मैच के बीच में पता चला कि वह अपने देश के लिए खेलने जा रहा है।
