11 साल बाद जेल से बाहर निकला रामपाल, कड़ी सुरक्षा के बीच सोनीपत सतलोक आश्रम पहुंचा, जानें क्या है पूरा विवाद

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सतलोक आश्रम मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे रामपाल को हिसार सेंट्रल जेल-2 से रिहा कर दिया गया है. करीब 11 साल 4 महीने और 24 दिन जेल में बिताने के बाद रामपाल जेल से बाहर आया है. ये रिहाई उसे देशद्रोह के मामले में जमानत मिलने के बाद मिली है. दरअसल 8 अप्रैल को पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट ने रामपाल को देशद्रोह के केस में जमानत मंजूर की थी. अदालत के आदेश के अनुसार रामपाल के वकीलों ने हत्या के दो मामलों में 5-5 लाख रुपये के बेल बॉन्ड जमा कराए. सभी कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें शुक्रवार को जेल से रिहा किया गया.

जमानत के बाद जेल से बाहर आया रामपाल: बताया जा रहा है कि रामपाल जेल से बाहर हंसता हुआ निकला. इस दौरान गेट पर तैनात पुलिस कर्मचारी ने रामपाल के सामने हाथ भी जोड़े. इसके बाद रामपाल सफेद पर्दे लगी फॉर्च्यूनर कार में बैठकर हिसार से सीधा सोनीपत जिले के गोहाना में स्थित धनाना सतलोक आश्रम के लिए रवाना हुआ. उसके काफिले में डिफेंडर, फॉर्च्यूनर जैसी 20 गाड़ियां मौजूद रही. हरियाणा पुलिस की एक गाड़ी ने रामपाल के काफिले को एस्कॉर्ट किया.

सुरक्षा के पुख्ता इंताजम: रिहाई के दौरान प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया, क्योंकि पहले भी उसके समर्थकों की भीड़ कई बार कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन चुकी है. जेल के बाहर पुलिस की तैनाती बढ़ाई गई और पूरे घटनाक्रम पर नजर रखी गई. रामपाल की जमानत मंजूरी का पता चलने पर हिसार सेंट्रल जेल टू के बाहर रामपाल के समर्थकों की भीड़ जमा होना शुरू हो गई. यहां उसके समर्थक दंडवत प्रणाम करते हुए नजर आए.

हाई कोर्ट ने लंबी हिरासत और उम्र को माना अहम आधार: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने जमानत देते समय इस बात पर जोर दिया कि रामपाल करीब 11 साल से जेल में बंद है और उसकी उम्र भी काफी ज्यादा हो चुकी है. कोर्ट ने ये भी माना कि केस का ट्रायल अभी लंबा चलेगा और कई गवाहों की गवाही बाकी है. इन परिस्थितियों में कोर्ट ने कहा कि इतनी लंबी हिरासत के बाद जमानत देना उचित है. साथ ही ये भी देखा गया कि कई सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता के आधार पर भी राहत दी गई.

कोर्ट की सख्त शर्तें, भीड़ जुटाने पर साफ रोक: जमानत देते समय हाई कोर्ट ने रामपाल पर सख्त शर्तें भी लगाई हैं. उसे निर्देश दिया गया है कि वो किसी भी तरह की भीड़ को इकट्ठा नहीं करेगा और ना ही ऐसी गतिविधियों में शामिल होगा. जिससे कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका हो. कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर उसने मोब मेंटालिटी को बढ़ावा देने की कोशिश की या किसी को भड़काया, तो उसकी जमानत तुरंत रद्द की जा सकती है. ये शर्तें इसलिए भी अहम हैं क्योंकि 2014 में उसके समर्थकों की भीड़ ने हालात को पूरी तरह बेकाबू कर दिया था.

कब शुरू हुआ विवाद? रामपाल की रिहाई सिर्फ एक कानूनी घटना नहीं है, बल्कि उस लंबे विवाद की वापसी है. जिसकी शुरुआत 2006 में हुई थी. 12 जुलाई 2006 को रोहतक के करोंथा गांव स्थित उसके आश्रम में हिंसा भड़क गई थी. इस झड़प में एक व्यक्ति की मौत हो गई, जिसके बाद पुलिस ने रामपाल के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया. ये घटना रामपाल के जीवन का पहला बड़ा मोड़ बनी, जिसने उसे एक साधारण संत से विवादों के केंद्र में ला खड़ा किया. इसी केस में उसे गिरफ्तार किया गया और करीब 22 महीने जेल में रहना पड़ा. अप्रैल 2008 में उसे जमानत मिली, लेकिन ये राहत आगे आने वाले बड़े विवादों की शुरुआत साबित हुई.

बरवाला शिफ्ट हुआ आश्रम: जमानत मिलने के बाद रामपाल ने अपना ठिकाना हिसार के बरवाला में बना लिया, जहां उसका बड़ा आश्रम खड़ा हुआ. करोंथा हिंसा मामले की सुनवाई भी हिसार कोर्ट में ही चलने लगी. समय बीतता गया, लेकिन केस खत्म नहीं हुआ. जुलाई 2014 में इसी मामले में रामपाल को हिसार कोर्ट में पेश होना था, लेकिन इस पेशी ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया. अदालत परिसर में उसके समर्थकों और वकीलों के बीच टकराव हो गया, जिससे मामला और गर्मा गया. ये घटना इतनी गंभीर हो गई कि वकीलों को हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा.

हाई कोर्ट ने दिए गिरफ्तारी के आदेश: हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए रामपाल को पेश होने के आदेश दिए, लेकिन जब वो पेश नहीं हुआ, तो कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और पुलिस को उसे गिरफ्तार कर पेश करने के निर्देश दे दिए. यहीं से कहानी ने खतरनाक मोड़ लिया. गिरफ्तारी से बचने के लिए रामपाल ने बरवाला आश्रम को किले में बदल दिया. आश्रम के चारों ओर समर्थकों की मानव श्रृंखला बना दी गई. हजारों लोग अंदर जमा हो गए और पुलिस के लिए स्थिति चुनौती बन गई. नवंबर 2014 में पुलिस ने आश्रम की घेराबंदी की, लेकिन ये कोई सामान्य ऑपरेशन नहीं था. करीब 14 दिन तक गतिरोध बना रहा और हालात लगातार तनावपूर्ण बने रहे.

आश्रम बना किला, अंदर छिपा रहा रामपाल: इस पूरे घटनाक्रम के दौरान रामपाल आश्रम के अंदर ही रहा. उसके चारों ओर महिलाएं, बच्चे और निजी सुरक्षाकर्मी मौजूद थे. पुलिस के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील थी, क्योंकि अंदर बड़ी संख्या में लोग थे. 18 नवंबर 2014 को जब पुलिस आखिरकार आश्रम के अंदर दाखिल हुई, तो हालात बिगड़ गए और भारी हंगामा हुआ. इसी ऑपरेशन के बाद रामपाल को गिरफ्तार किया गया और उसके खिलाफ कई गंभीर मामले दर्ज किए गए.

इंजीनियर से संत बनने तक का सफर: रामपाल मूल रूप से सोनीपत जिले के धनाना गांव का रहने वाला है. उसने अपने करियर की शुरुआत सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के रूप में की थी. लेकिन 1995 में उसने नौकरी छोड़ दी और रोहतक के करोंथा गांव में सतलोक आश्रम की स्थापना की. यहां से उसने ‘नामदान’ देना शुरू किया और धीरे-धीरे कबीर पंथी संप्रदाय में एक बड़े चेहरे के रूप में उभरा. हालांकि, आर्य समाज को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों के कारण उसका टकराव हुआ, जिसने उसे लगातार विवादों में बनाए रखा.

देशभर में फैला नेटवर्क, हरियाणा में मजबूत पकड़: रामपाल का प्रभाव सिर्फ एक आश्रम तक सीमित नहीं रहा. देशभर में उसके करीब 15 आश्रम बताए जाते हैं, जिनमें से पांच हरियाणा में हैं. भिवानी, सोनीपत के धनाना, रोहतक के करोंथा और हिसार के बरवाला स्थित आश्रम उसके मुख्य केंद्र रहे हैं. इनमें से बरवाला आश्रम सबसे ज्यादा चर्चित रहा, जो फिलहाल कोर्ट केस के चलते अटैच संपत्ति है. पिछले 11 साल से इस आश्रम पर पुलिस की निगरानी बनी हुई है, जो इस पूरे मामले की गंभीरता को दिखाती है.

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